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Rishabh Tomar

Abstract

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Rishabh Tomar

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फस्ले बहार-

फस्ले बहार-

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जब से तुम्हें देखा तो 

सिर्फ मैंने तुमको सोचा

इजहार नही किया पर

दिल के मंदिर में तुम्हें पूजा


मैं वहाँ वहाँ पर रहा

जहाँ जहाँ तेरा साया ठहरा

इस तरह ख़ुद पर

कर लिया तुम्हारा पहरा


मैंने तेरी सहेलियों से 

तेरा पता ठिकाना पूछा

उन्होंने चंद नखरों के बाद

अपनी जुबाँ को खोला


स्वर्णिम पन्नों पे लिखा

प्यारा सा अल्फाज बोला

औऱ तुम्हारा नाम

महक बता डाला


अंधेरे से जीवन मे छाया

उसी पल से उजाला

मैंने उसी दिन से

फूलों को दिल से लगाया


उन्होंने तुम्हारा पता जब रचना बताया

उसी पल मैंने एक गीत रच डाला

और मकान तम्मना बताया

तो मैंने उसे पाने की ख्वाहिश बनाया


जब वो मिलने आई 

तो आने की दस्तक हवाएं लाई

इन मचलती सर्द हवाओं में 

उसके आने से महक छाई


जब वो खुलकर मुस्काई 

तो फस्ले बहार छाई

उसकी उदासी से कायनात में

मोसिमें खिजाँ आई


जब उसने मेरी रूह को छुआ

तो मुझे ऐसा लगा

जैसे सिर्फ मेरा इस दुनियाँ में

एक मात्र वो ही है सगा


वो मुझे ऐसी लगी

जैसे रूह से पाक आयत लिपटी हो

गीता के शब्दों सी महक उठती हो

उसकी एक पल की हँसी से


मेरी शामों सहर बन गई

उलझी हुई थी जिंदगी मेरी

प्यारी सी गजल की बहर बन गई

अगर तुम्हारी कहूँ तो तुम


सरहदों के पार भी हो

इस पार उस पार क्या कहूँ

तुम मेरा पूरा संसार भी हो

मेरी रूह तुम्हारी रूह से मिलती है


मेरे शब्दों की आत्मा में तुझे सिलती है

कितनी भी बंदिशें हो अड़चनें हो आयत !

मोहबत ने न कभी हार मानी है।


इन मुश्किलों से मत घबरा

जमाने तो सिर्फ नफरतें ही जानी है।


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