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Niketan Jangra

Romance

3.3  

Niketan Jangra

Romance

पहरा

पहरा

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जिंदगी के ऐसे मोड़ पर खड़ी हूँ

जहाँ पर लाखों लोग मेरे साथ खड़े हैं

और उससे भी कहीं ज्यादा मेरे पीछे

पर फिर भी अकेली हूँ

इच्छा तो कोई नहीं है

पर चाहत है उसकी जो हाथ पकड़कर कहे

कि आओ मैं तुम्हें रास्ता दिखाऊँ

और उस भीड़ को पीछे छोड़ते हुए

मैं उसके साथ चल दूँ बिना किसी उवाच के

चलते-चलते जब भी किसी

परेशानी के बारे में सोचूँ तो कहे

"तुम सामना तो करो मैं तुम्हारे साथ हूँ"

हिम्मत तो है अकेले चलने की 

कि हिम्मत तो है अकेले चलने की

मगर चाहत हिम्मत बढ़ाने वाले की है।

लाखों की भीड़ करोड़ों की आबादी और

अनगिनत रूहों के बीच से यूँ

तुम्हारी छाया में गुजरना

मानो सब कुछ रुक सा गया है

और ये दिल गम भूल सा गया है

मानो विचारों में कुछ घुल सा गया है

लोगों से सुना था कि जीवन की

राह पर चलना अकेला है

और तुम जाओ मत

तुम्हारी छाया की चमक में कुछ सुनहरा सा है

मानो, सब कुछ बदल से गया है

कभी तितलियाँ उड़ती हुई दिखती हैं तो

कभी सूरज अपने ललाट पर चमकता है

दिखता हर तरफ तेरा ही चेहरा है

ये इश्क़ नहीं तो क्या?

किसी का पहरा है . . .



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