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Niketan Jangra

Abstract

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Niketan Jangra

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अकेलापन

अकेलापन

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रोज रात अकेले बैठने का दिल करता है

खूद से बातें करने का मन करता है

ये दुनिया भले कितनी भी बुरी हो

मगर अच्छा बनने का जी करता है

ज्यों-ज्यों रात बीतती है

चंद्रमा और भी खूबसूरत होता जाता है

भले मेरे कितने भी सपने टूटे हों

मगर इन आँखों को कहाँ कुछ और नज़र आता है

उसी पल एक और (सपना) तैरने लग जाता है

जैसे-जैसे रात गहराती जाती है

वैसे-वैसे विचारों में भी गहनता आती जाती है

और फिर यू हीं करते

एक और रात बीत जाती है

अगली सुबह का नजारा बड़ा ही कमाल होता है

दिल में आँधी तो कभी तूफान होता है

कोई पहचान ना ले पुरानी सीरत को

इसलिए रोज एक नया नकाब इस चेहरे पर होता है

यूहीं चेहरे पर खुशी हर रोज

इस दिल में एक नया गम छुपाती है

किसी से कहें तो भी कैसे?

धीरे-धीरे छुपाने की आदत जो पड़ जाती है.



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