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Vishrant gupta

Abstract Others

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Vishrant gupta

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"नीलिमा तुम्हारी आँखों की"

"नीलिमा तुम्हारी आँखों की"

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नीलिमा तुम्हारी आँखों की, सपनों में उतर आई,
शब्द बिना ही छू गई कुछ, पीड़ा बनकर परछाई।
फूलों-सी सौंधी साँसों में, जो सच्ची-सी खुशबू है,
वही हवा जब आई छूने, मन की वीणा लहराई।

बोलो कुछ मत, चुप रहना भी, गीतों-सा बहता है,
तेरा मौन अचानक मन की, धरती पर बरसता है।
तुम जब हौले हँसती हो तो, लगता है हर बार,
सावन कोई बाँहें फैला, पलकों में बसता है।

तेरी चूड़ियाँ कहती हैं, भावों की वो कहानी,
हर खनक में सौ गाथाएँ, हर लय कोई रवानी।
स्पर्श-रूप वो आँखों से, बिना कहे कह जाते,
प्रेम अधूरा हो जाए पर, तुझमें है पूर्ण जवानी।

तेरा नाम जपूँ साँझ-सवेरे, जैसे मंत्र पुराना,
तेरा चित्र खिंचा है मन पर, बिन रंगों के खजाना।
जो भी लिखूँ वो तेरे लिए हो, शब्दों की पूजा,
तू ही मीत, प्रिया, आराध्य बन, तू ही सारा ज़माना।

तू श्रृंगार है हर भाव का, तू कविता का आधार,
तेरी छवि में दिखता मुझको, मन का सबसे प्यारा संसार।


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