फूलों का विदा गीत
फूलों का विदा गीत
1 min
305
झर गए गुलाब के होंठों से हँसी के रंग,
एक आख़िरी साँस में छुपा रहा उनका संग।
ओस की बूंदों में भीगी थी आखिरी बात,
फूलों ने विदा ली जैसे हो कोई जात।
पंखुड़ियाँ कह गईं —
"हम खिले थे तुम्हारे लिए,
हर काँटे की चुभन सहकर भी,
सुगंध बनकर बहे थे तुम्हारे लिए।"
बगिया की शाख़ें तक हिलती रहीं मौन,
ना कुछ कहा, ना कोई राग, ना कोई गौण।
बस हवा ने धीरे से सिर झुकाया,
जैसे अंत में भी प्रेम ने सिर उठाया।
वो रंग जो चुरा लिए थे हमने सुबह से,
अब लौटाने हैं उन्हें सांझ की परछाई में।
हम मिटेंगे ज़रूर, पर कहानी रहेगी,
किसी की स्मृति में, किसी की तन्हाई में।
हे जीवन! हम फूल ही तो थे,
खिलने के लिए, बिखरने के लिए,
पर जब भी बिखरें, कविता बनकर रह जाएँ,
तेरे अंतस को छू जाएँ...
