नि:शब्द-लोक
नि:शब्द-लोक
है कुदरत का इक ऐसा छोर,
जहाँ न जाए जगत का शोर।
वहां रहना चाहूंँ सदा आसीन,
और रहूं बजाता प्रेम की बीन।
मदमस्त रहूं, मैं मन में मगन,
जलती रहे, विरहा की अगन।
वहाँ ऐसा कुछ कुछ होता है,
शब्द अपनी पहुंच खोता है।
नहीं गुरू कोई, नहीं कोई गुर,
वो अहसास तो गूँगे का गुड़।

