नभचर
नभचर
भोर हुई बना दल नभ में भरते उड़ान नभचर घोंसलों से दूर,
साँझ ढ़ले फिर बना दल नभ में भरते उड़ान अपने घोंसलों की ओर,
संख्या है अनंत मित्रों की, रंग देते आकाश अपने रंग में,
भाषा में अपनी करते चलते न जाने कितनी बातें अनगिनित,
देख दृश्य यह लगती थी होने ईर्ष्या इन पक्षियों से,
है कितना स्वच्छंद जीवन इनका, न दायित्व कोई, न कोई चिन्ता,
काश होते पंख मेरे भी, लगाती चक्कर आकाश में बिन रोक टोक,
चीरती हुई मेघों के सीने को जा बैठती हिमाच्छादित पर्वत की चोटी पर,
उड़ती गंगा ऊपर, कर क्रीड़ा जल में फिर झट जा बैठती चीड़ के वृक्ष पर,
होता कितना आन्नदमय मनोरंजक जीवन !
दौड़ता मचलता मन पाने को है वही नहीं जो उसके पास,
माना हैं पंख नहीं पास तुम्हारे कि उड़ चलो जी चाहे जहां,
परन्तु देखो है कठिन कितना………….
जीवन नभचर का, है दायित्व इन पर भी परिवार का,
करते निर्माण छोटे से आशियाँ का अपने, कर एकत्रित एक एक तिनका,
है कितना कठिन रखना सुरक्षित परिवार को अपने इस घोंसले में,
जाते ढ़ूंढ़ने जब वो दाना, रहते चिन्तित सुरक्षा के लिये अपने,
बिन पंख के नन्हे-नन्हे बालकों के प्रति होते जो असुरक्षित अकेले,
न जाने कब मार गिराये नभचर बड़े-बड़े।
हैं असम्भव बचाना पेड़ पर टंगे घर को,आँधी, वर्षा, तूफ़ान से,
कितना कठिन है करना दृष्टिपात धरती पर गिरे घोंसले पर,
होते हैं जिसमें परिवार के नन्हें नन्हें से सदस्य!!!!!
हाँ है सत्य यह कहाँ है जीवन स्वच्छंद जीव का किसी भी?
पशु, पक्षी, वनस्पति हैं जीवन पथ सभी के भरे काँटों से,
की प्रदान क्षमता मानव को ईश्वर ने अधिकतम,
मुश्किलों से लड़ भर सकते हो उड़ान नभचर की भाँति जीवन पथ पर,
है शक्ति तुममें रखने को सुरक्षित आशियाँ अपना हर मार से मौसम की,
हौसला है भरपूर तुममें निभाने का दायित्व परिवार के प्रति अपने,
संचालन से बुद्धि का कर सकते हो हल राह रोकने वाली हर समस्या का,
जगा लो सोये हुए आत्म विश्वास को तो स्थान न मिलेगा हृदय में ईर्ष्या को,
फिर होगा आन्नदमय मनोरंजक जीवन तुम्हारा भी !
