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Dr Reshma Bansode

Abstract

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Dr Reshma Bansode

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मुलाकात

मुलाकात

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कुछ मुलाकातें हमेशा के लिए साथ रह जाती है,

ऐसी ही एक मुलाकात थी उस अजनबी से।

याद नहीं ठीक से यह भी कुछ पल गुजारे थे,

या कुछ घंटे या कुछ सदिया। 

एक अजनबी से हुई एक मुलाकात बड़ी ही अजब थी।


याद तो यह भी नहीं जाने क्या-क्या बातें की,

ट्रेन का सफर था आमने सामने बैठक थी।

और बस फिर शुरू हुआ बातों का सिलसिला।

एक अजनबी से वह मुलाकात बड़ी हि अजब थी।


ऐसा लग रहा था जैसे कोई पुरानी पहचान है।

बचपन के स्कूलवाली दोस्त या कॉलेज वाली दोस्ती जैसी। 

फिल्मों की बाते, पॉलिटिक्स घूमना फिरना

शेयर करना और न जाने क्या क्या।

 एक अजनबी से वो मुलाकात बड़ी ही अजब थी।


और फिर चाय आ गई।

चाय की चुस्कियों के साथ बाते और भी रूमानी हो गई।

 बाहर से गुजरते हुए खूबसूरत नजारे,

बातों को जैसे चार चांद लगा रहे।

 एक अजनबी से वो मुलाकात बड़ी ही अजब थी।


ऐसा लग रहा था जैसे कोई इंजीनियर होगा,

पूछा नही मैने।

शायद उसने भी जान लिया हो मैं क्या करती हु।

एक अजनबी से वो मुलाकात बड़ी ही अजब थी।


कुछ पलों का तो साथ था,

 इसलिए ज्यादा जानना मुनासिब नहीं समझा।

बस बातें करते रहे शायद सफर की

बोरियत को मिटाने की कोशिश थी।

एक अजनबी से वह मुलाकात बड़ी ही अजब थी।


कुछ घंटों बाद अपने अपने ठिकाने आ गए।

गुड बाय कह कर अलग हो गए।

 नाम जानना भी जरूरी नहीं समझा था।

 ना उसने पूछा, न मैंने पूछा।

एक अजनबी से वह मुलाकात बड़ी ही अजब थी।


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