Vinita Rahurikar
Abstract
मोहरा बनाकर
उतारा है धरती पर
तूने ऐ जिंदगी।
कदम भी उठाऊँ
तो तेरी मर्ज़ी से
कभी एक घर
कभी ढाई घर।
कभी कदम गलत उठा
तो तू छोड़
देती है साथ।
उतार देती है नीचे
जीवन की बिसात से
मोहरे बन हम,
चलते हैं एक-एक घर
तेरे ही हिसाब से.....।
प्रेम
चल रही हूँ मै...
कहाँ नहीं हो ...
आईना
मुहब्बत बंजार...
बेटा...
तलहटी
वर्जनाएँ...
विश्व एकता दि...
जीवन एक खेल.....
जीवन यापन हो गया दुश्वार लेकिन फिर भी जिंदा हूँ। जीवन यापन हो गया दुश्वार लेकिन फिर भी जिंदा हूँ।
तेरे दिल में मकान हो जाये,,,,, मेरा अब इम्तिहान हो जाये। तेरे दिल में मकान हो जाये,,,,, मेरा अब इम्तिहान हो जाये।
तरक्की के रास्तों पर सबसे ऊँचे हमारे मकान है। तरक्की के रास्तों पर सबसे ऊँचे हमारे मकान है।
सिर्फ टूटी हुई दीवारों से नहीं बनते खंडहर। सिर्फ टूटी हुई दीवारों से नहीं बनते खंडहर।
चलो लम्हे चुराते हैं चलो यादें सहलाते हैं ! चलो लम्हे चुराते हैं चलो यादें सहलाते हैं !
तुम्हारा एक गलत फैसला हमारे रिश्तों में दूरियाँ बढ़ा गया, तुम्हारा एक गलत फैसला हमारे रिश्तों में दूरियाँ बढ़ा गया,
चौतरफा है हाहाकारी, आस प्रभु तुम लोग।। बदला है जमाना चौतरफा है हाहाकारी, आस प्रभु तुम लोग।। बदला है जमाना
हर किसी पे ही उल्फ़त लुटाती रही जिंदगी प्यार के गीत गाती रही। हर किसी पे ही उल्फ़त लुटाती रही जिंदगी प्यार के गीत गाती रही।
हिन्दी हर भारतवासी का राष्ट्रीय मान सम्मान है इसका ज्ञान बंटता रहे, यह अपना अभिमान है। हिन्दी हर भारतवासी का राष्ट्रीय मान सम्मान है इसका ज्ञान बंटता रहे, यह अपना अभि...
ज़िन्दगी की धुंध में एक अक्स धुँधला सा है दिखता। ज़िन्दगी की धुंध में एक अक्स धुँधला सा है दिखता।
दो के छक्के बारा, शौचालय हो प्यारा। दो के छक्के बारा, शौचालय हो प्यारा।
आओ हिन्दी भाषा पर हम गर्व करें हिन्दी भाषा का ही प्रयोग सर्वत्र करें। आओ हिन्दी भाषा पर हम गर्व करें हिन्दी भाषा का ही प्रयोग सर्वत्र करें।
चरे जा रहे पावन संस्कृति, निर्बल-निर्बल हुआ शहर। चरे जा रहे पावन संस्कृति, निर्बल-निर्बल हुआ शहर।
चिंता तुम ना कोई करना, जग का होगा मंगल जी। चिंता तुम ना कोई करना, जग का होगा मंगल जी।
जितनी बार इसे देखा हर बार अलग अलग दिखी ये दुनिया बड़ी अलबेली सी है। जितनी बार इसे देखा हर बार अलग अलग दिखी ये दुनिया बड़ी अलबेली सी है।
आप भी एक बार फिर से जान लो कैलेण्डर ही मेरा नाम है। आप भी एक बार फिर से जान लो कैलेण्डर ही मेरा नाम है।
चश्म-ए-तर से जो, बहे जाते हैं अश्क समंदर ना सही, मगर कोजा-ए-मुट्ठीभर तो हो… चश्म-ए-तर से जो, बहे जाते हैं अश्क समंदर ना सही, मगर कोजा-ए-मुट्ठीभर तो हो…
जब सामना हो अत्याचार से तो बंदूक़ नहीं कलम उठाइए। जब सामना हो अत्याचार से तो बंदूक़ नहीं कलम उठाइए।
आडंबरों से दूर ही रहता नहीं कर्म कांड में वास आडंबरों से दूर ही रहता नहीं कर्म कांड में वास
क्यूँकि यादें उन्हीं लोगों के साथ सृजित होती हैं जो हमारे दिल के बेहद करीब होते हैं। क्यूँकि यादें उन्हीं लोगों के साथ सृजित होती हैं जो हमारे दिल के बेहद करीब होत...