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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Abstract

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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

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मन इच्छा नगरी का राजा है

मन इच्छा नगरी का राजा है

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इच्छा रूपी नगरी का मन राजा है 

जो बहुत संवेदनशील है 

और हमेशा सही का साथ देता है 

लेकिन इस नगरी में 

लोभ, लालच, कामना , वासना 

घुसपैठ करके आ गये हैं 

जिसने इस नगरी में गहन 

उथल पुथल मचा दी है 

जिसके कारण 

सच्चाई और ईमानदारी का 

सिंहासन डोलने लगा है 

इस सिंहासन पर 

बेइमानी, मक्कारी , स्वार्थ 

घात लगाकर बैठे हैं 

कि जरा सा भी मौका मिले 

तो वे इस पर कब्जा कर लें । 

इन्होंने अपने साथ 

काम क्रोध मद लोभ 

को भी मिला लिया है । 

अंदर ही अंदर सत्ता के लिए 

अच्छाई और बुराई में 

भयंकर संघर्ष हो रहा है । 

छल कपट रूपी हथियार से 

बुराई ने तहलका मचा दिया है 

मगर विवेक , साहस और धैर्य ने 

उनके छक्के छुड़ा दिए हैं । 

बुराई हमेशा हारती है 

और कट कर गिर पड़ती है 

मगर , कामनाओं और वासनाओं के 

अमर कुंड में गोते लगाकर 

फिर से जी उठती है और फिर से 

फन फैलाकर बैठ जाती है । 

इस काले नाग को पकड़ने हेतु

व्रत, उपवास, सत्संग, धर्म, दर्शन 

रूपी सपेरे बुलवाये जाते हैं । 

यहां पर गलियां 

घृणा, वैमनस्य, भेदभाव से 

अटी पड़ी हुई हैं 

यद्यपि प्रेम रूपी स्वच्छ बौछारों से

इन गंदगियों को साफ करते हैं 

मगर ये गंदगियां जाते जाते आखिर 

काले धब्बे छोड़ ही जाती हैं 

ये सब की सब बीमारियां 

शुद्ध विचारों से बहुत डरती हैं 

इसलिए ये प्रयास करतीं हैं कि 

शुद्ध विचारों को रोक लिया जाए 

मगर योग, साधना, भक्ति जैसे 

साथी शुद्ध विचार लेकर आते हैं । 

शुद्ध विचार बहार की तरह होते हैं 

जो मन रूपी नगरी को महकाते हैं 

अध्यात्म यहां का महामंत्री है 

जो मन रूपी राजा को सलाह देता है 

रीति रिवाज , परंपराएं दिशा दिखाती हैं 

जब मन रूपी राजा 

मोहग्रस्त हो जाता है 

तब वह जनहित को भूलकर 

स्वहित को प्रश्रय देना शुरू करता है 

वहीं से अराजकता, अन्याय, अनैतिकता

जन्म लेकर भयंकर उत्पात मचाते हैं 

न्याय कहीं पर दुम दबाकर 

भाग जाता है और 

अपराध , अन्याय का 

बोलबाला हो जाता है । 


दिमाग की खिड़की 

हमेशा खुली रहनी चाहिए

जिससे शुद्ध विचार आते रहें 

और अंदर की गंदगी को 

जड़ से साफ करते रहें । 

प्रेमरूपी अमृत का सेवन 

हरदम करते रहिए जिससे 

मन रूपी राजा 

इच्छा रूपी नगरी पर 

सदैव शासन करता रहे । 



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