STORYMIRROR

ritesh deo

Abstract

4  

ritesh deo

Abstract

महिला और हड़ताल

महिला और हड़ताल

2 mins
393

मैं चाहती हूँ

दुनिया की तमाम स्त्रियां

एक दिन की हड़ताल पर चली जाएं


माँएं छुट्टी लें महानता के पद से

एक दिन रोते बच्चे को पुरुष के जिम्मे छोड़

अपनी पसंद का उपन्यास पढ़ने बैठ जाएं

चार बार उठे बिना चैन से हो खाना


खाने के बीच साफ न करनी पड़े बच्चे की पॉटी

आधी रात बच्चे के रोने से न टूटे नींद

अलसुबह न उठना हो दूध पिलाने 

उस एक रात बचपन की सहेली को बुला

ड्राइंग रूम में सोफे पर फैल

देर रात तक मारें गप्पें

सारी माँएं इस दिन बच्ची बन जाएं


प्रेमिकाएं सारे चुम्बन स्थगित कर

अपने बाएं पैर की छिंगली से

प्रेमी के अहंकार को परे झटक

निकल पड़ें लॉन्ग ड्राइव पर

लौटकर बताएं कि कितना उबाऊ है प्रेमी का लहज़ा


और प्यार का तरीक़ा बोझिल

बताएं कि वो आज भी हैं प्रेमी से बेहतर

और शहर में अब भी हैं कई ख़ूबसूरत नौजवान 

आज भी है बारिश कितनी रोमांचक

आज भी है संगीत कितना मोहक

प्रेम करने के लिये और भी अच्छी चीजें हैं दुनिया में


पत्नियों को तो हड़ताल के लिए

इतवार ही चुनना होगा

उस दिन वो सोयी रहें देर तक 

और उठकर सबसे पहले

घर के सामने लगाएं अपनी नेमप्लेट


ये उन्हीं का चुना हुआ नाम हो

जिसे पुकारा जाना सबसे मीठा लगे

फिर अपने घर में इत्मीनान से पसर चाय पियें

इस वाले इतवार पत्नियां पहनें

अपनी पसंद का रंग 

खाएं अपने स्वाद का खाना 

टीवी का रिमोट हो उन्हीं के हाथ

अपनी मर्ज़ी से देखें वो दुनिया 


हड़ताल वाले दिन

सारी कामकाजी औरतें 

दफ़्तर की लॉबी में बैठ ताश खेलें 

ज़ोर ज़ोर से करें बातें

उनके कहकहों से गूंज उठे दफ़्तर

उनकी मौजूदगी से भर जाए हर कोना

उस दिन इन्हीं का कब्ज़ा हो

रिसेप्शन, कॉरिडोर, गेस्ट रूम और लिफ़्ट पर

सारे आदमी सीढ़ियों से चढ़ें-उतरें

रोज़ उन्हें घूरने वाली नज़रें


जो बचकर निकलने की कोशिश में हों

तभी कोई कोकिला गुनगुना उठे

'हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह 

उठती है हर निगाह खरीदार की तरह'

यूं शर्म से पानी-पानी आदमी के जूते भीग जाएं


दुनिया की तमाम बेटियां, सहेलियां, सहकर्मी, दोस्त

दादी नानी चाची मामी बुआ भाभी

लेस्बियन स्ट्रेट सिंगल कमिटेड

यह वह ऐसी वैसी अच्छी बुरी

संज्ञा सर्वनाम क्रिया विशेषण


जिस दिन ये सब हड़ताल पर जाएंगी

यक़ीन मानिये

उस दिन सारे पुरुष

स्त्री होना सीख जाएंगे

उसी दिन वो पुरुष से मनुष्य में तब्दील होंगे...


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract