मेरी जिंदगी
मेरी जिंदगी
आज जब जिन्दगी खत्म होने को आई
तो लगा कि कुछ जिया ही नहीं ।
जब वक्त खत्म होने को आया
लगा कि किया ही नहीं ।
निकलता चला गया वक्त का धागा हाथ से
क्यूं मैंने कुछ सिया ही नहीं।
मेरे होंठों तक आया प्याला जिन्दगी का
क्यूं मैंने उसे पिया ही नहीं ।
बड़े ग़म दुनिया से लिए, लेके रख लिए
और वापिस दिया ही नहीं ।
ख़ूब सोचा कि कुछ लिखूं
अपने शब्दों को मैंने लिखा ही नहीं ।
ख़ूब सिखाया इस जिन्दगी ने मुझे
पर मैंने कुछ सीखा ही नहीं ।
रही खाली कागज़ सी मेरी जिंदगी,
साफ़ सुथरी पाक जिंदगी,
आज जिऊंगी, कल जिऊंगी
पर अब तक मैंने कुछ जिया ही नहीं I
