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भाऊराव महंत

Abstract

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भाऊराव महंत

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मेरा वतन

मेरा वतन

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विकास की चले वो राह ये खुदा मेरा वतन 

चलो चलें वहाँ जहाँ पे है खड़ा मेरा वतन


खुदा अगर कहीं पे हैं तो वो तो है मेरा वतन 

मेरे लिए खुदा का नाम दूसरा मेरा वतन


रहे गुलाम जो यहाँ मिले उसे सकूँ कहाँ 

स्वतंत्रता मिले जिसे उसे मिला मेरा वतन


कहीं गुलाब हैं खिले कहीं खिलें है मोंगरे 

बड़ी ही खूबसूरती से है सजा मेरा वतन


यहाँ वहाँ कहाँ कहाँ मैं घूमता रहा जहां 

कहीं नहीं मिला मुझे वो दूसरा मेरा वतन 


उठे समाज के लिए गिरे समाज के लिए 

समाज कार्य हित खड़ा रहा सदा मेरा वतन


यहाँ गया वहाँ गया लेकिन जहाँ जहाँ गया 

नहीं मिला मुझे कहीं जमीन पे मेरा वतन


नई नई सी जिंदगी नये नये से हौसले 

मिला हमे यहीं से है ये फैसला मेरा वतन


अगर मगर करें नहीं डगर डगर चले वहीं 

अगर मगर कभी यहाँ नहीं किया मेरा वतन


जवान तो वही यहाँ डरे नहीं कभी कहीं 

जो डर गया वो मर गया कहे ऐसा मेरा वतन


जो काम कर रहे यहाँ खबर नही किसी को भी 

नहीं चले पता जो काम कर रहा मेरा वतन


सवाल देश का हो जब जवाब हम है दे रहे 

सवाल का जवाब भी सवाल सा मेरा वतन


हटा नहीं डटा वहीं वो वीर था मरा नहीं 

शहीद नाम दे गया सदा सदा मेरा वतन


कठोर से कठोर को बना दिया सरल यहाँ 

मगर कभी कठोर तो नहीं बना मेरा वतन।


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