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Hema kandpal

Abstract

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Hema kandpal

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मेहंदी ‘हिना’ हुई

मेहंदी ‘हिना’ हुई

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कोपलों सी खिल रही थी

राग-अलाप से मिल रही थी

कभी पंछी सहलाते थे,

कभी बादल नहलाते थे

वो ये सोच मुरझा गई

थोड़ा रोयी फिर सकुचा गई।


एक हाथ आया उसे लेने

एक हाथ के लिए...

रविसुता रचाना चाहती थी 

जिसे अपने नाथ के लिए...


उन कोपलों से पृथक पल्लव हुए

अश्रु थे जो सारे वो मानो लव हुए

कुंतल घसीटे गए ऐसे

सौदामिनी बरसी जैसे

हिना को पीसा जाने लगा...

फ़िर,

मेघपुष्प से मिलन हुआ,

थोड़ा अकुचाई, थोड़ा लज्जाई

फिर घुल उसमें कुन्दन हुई


किसी का हाथ संवारने को

किसी का भाग्य निखारने को

वो केसरी उत्साह लिए

वो मखमली एहसास लिए

वो सुरभी कुंडलित अमृत जैसे

शशिप्रभा हो सीपिज जैसे

जैसे हो धरा सांझ ओढ़े 

वो ख़ुद में अंबु निचोड़े


इक सुंदरी का गहना हुई...

आज मेहंदी हिना हुई!


उपवन से बयार संग जो आ चली थी

वो आज कर की शोभा हो चली है

वो बसंती रंग हाथों में छूट जाता है...

शायद तभी, मेहंदी का दिल टूट जाता है।


यही सोच...

मेहंदी अपने हाल पर रो देती है

जब वो लड़की हाथ धो देती है।


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