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कोपलों सी खिल रही थी राग-अलाप से मिल रही थी कभी पंछी सहलाते थे, कभी बादल नहलाते थे वो ये सोच मुर... कोपलों सी खिल रही थी राग-अलाप से मिल रही थी कभी पंछी सहलाते थे, कभी बादल नहला...