STORYMIRROR

Babita Consul

Abstract

3  

Babita Consul

Abstract

मैं स्त्री

मैं स्त्री

1 min
289

मुस्कुराहट से खिलते हैं फूल 

गुनगुनाहट से चलती है श्वास

नदी की मानिंद बहती हो 

बहता है जीवन संसार।


हर दुविधा में, संघर्षों में 

दुख हो या पीड़ा में 

डगमगाते नहीं कभी कदम 

भरी हो साहस से, हर पल 

खिलती हो फूलों सी।


बनी रहती कोमलता,

खुशबू भरी स्वच्छता,

आचँल में समेटती हो,

मृदुता को धरती का सौभाग्य हो।


धरती के भाल पर

सूरज सी बिन्दी सम,

तुम बिन नहीं दुनिया का विस्तार 

तुम ही प्रकृति, तुम ही शक्ति।


तुम ही विधाता का

अनुपम उपहार ,

तुम हो स्त्री, तुम हो मां।

तुम से ही है, ये संसार।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract