STORYMIRROR

AVINASH KUMAR

Abstract Children Stories

4  

AVINASH KUMAR

Abstract Children Stories

मैं फैन्टेसी बुनता हूं

मैं फैन्टेसी बुनता हूं

2 mins
249


मैंने कहा-मैं फैन्टेसी बुनता हूँ

उसने कहा-चलो, मैं खाना बनाती हूँ

मैंनें कहा-हँस तो दो

उसने कहा-कब से हँस ही तो रहे हैं

और वह हँस दी

मैंने कहा-कुछ बोलो

वह चुप रही

मैंने कहा-मैं मौन की भाषा समझता हूँ

उसने कहा- मैं ख़ामोशियों में बोलती हूँ

मैंने कहा-पर जब तुम बोलती हो

मेरे कानों में चाँदी की घंटियाँ-सी बजती हैं

उसने कहा-बजने दो

मैंने कहा-तुमने मुझे काम पर लगा दिया

उसने कहा-लगे रहो

मैंने कहा-कभी लिखा तक नहीं

और अब कर रहा हूँ प्रेम,

उसने कहा-करते रहो

मैंने कहा-तुम कहो तो ना करूँ ?

उसने कहा-खिलते फूल को कोई कहे

कि खिलना बंद कर दो

तो क्या नहीं खिलेगा ?

मैंने कहा-पर लोग ?

उसने कहा-उनकी छोड़ो, तुम्हें कैसा लग रहा है ?

मैंने कहा-आसमान में उड़ रहा हूँ

उसने कहा-उड़ो

मैंने कहा मैं सिर्फ तुमसे ही प्यार करता हूं

उसने कहा ये भी बताने की बात है क्या

मैंने कहा मैं सिर्फ तुम्हारे साथ रहना चाहता हूं

उसने कहा बस यही चाहत है मेरी भी

मैंने कहा-सागर की गहराई में उतर रहा हूँ

उसने कहा-उतरो

मैंने कहा-डूब रहा हूँ

और वह मेरे साथ डूब गई।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract