मैं नारी हूँ
मैं नारी हूँ
समझे न कोई मुझको मैं दुखियारी-बेचारी हूँ
प्रभु-जनने की शक्ति जिसमें हाँ मैं वही तो नारी हूँ
न चाह कोई है न आस कोई
न पीर का करे आभास कोई
त्याग-समर्पण भाव लिए मन
करता न इसपे विश्वास कोई
प्रेम और ममता की कोई देवी अवतारी हूँ
कर दफ्न ख्वाब अस्तित्व मिटाकर
हूँ रखती मैं पराया सदन सजाकर
केवल प्रेम-मान-सम्मान की भूखी
रखती हर एक को रिश्ते निभाकर
शिक्षा-भावना-संस्कारों की मैं तो चारदीवारी हूँ
अंतःपीड़ा न कोई समझे जाने
नहिं ठीक से कोई अपना माने
कहे दुनिया पीहर हुआ पराया
दे ससुराल में भी सब ही ताने
कहाँ मिला वो अपनापन-प्रेम जिसकी मैं अधिकारी हूँ
धर्म-कर्म संयम नियम है ईमान
अबला नहीं रही है मेरी पहचान
प्रत्येक क्षेत्र में सक्षम सबला हूँ
गौरवशाली अतीत की हूँ मैं शान
स्वाभिमान रखकर अपना मैं भावों से खुद्दारी हूँ
न किसी से ज़रा भी डरती
चीर अँधेरों को मैं बढ़ती
रुढ़िवाद हो या विवशता
हर बाधा से डटकर लड़ती
दृढ़ संकल्प लिया जो मन फिर
न हारी थी न हारी हूँ
पाणि दुर्गा लक्ष्मी काली स्वरुप
अनुरुप परिस्थिति के रूप अनूप
जुल्मों के विरोध में कट्टर घोर
अत्याचारी को दिखलाती कूप
कंधे-क़दम मिला चलती अब पुरुषों पर भारी हूँ
आग तीव्र मन लिए शीतल काया
प्रबल सरस भावना अद्भुत माया
भू अरु गृह स्वर्ग करने का ज़ज्बा
कोमल काया में शक्ति की छाया
भले हेतु भली पर बुरे हेतु लक्ष्मीबाई-झलकारी हूँ।
