STORYMIRROR

संजय कुमार

Abstract

3  

संजय कुमार

Abstract

लॉकडाउन में ट्रेन पटरी

लॉकडाउन में ट्रेन पटरी

1 min
18


मैं तो हूं एक ट्रेन की पटरी

चार माह से तेरे राह में तरसी

तेरे बिन लगती एक सूखी लकड़ी

ए हम साथी तू कहां गया है

नजरें तेरी चाह में तरसी

आंसू नदी की धारा बरसी

आजा मेरे मीत तू आजा

आके तू एक झलक दिखाजा

तू जब मुझपे चलता था 

आनंद मुझे बहुत आता था

जिधर से भी तू जाती थी

खटपट की आवाज सुनाती थी

जब तू स्टेशन को आती थी

लोग एलर्ट हो जाते थे

स्टेशन पर जब रुक जाती थी

लोग जोरों से तुझ में घुस जाते थे

जब समय हो जाता था

दो हॉर्न देके चली जाती थी

मैं तो हूं एक ट्रेन की पटरी

चार माह से तेरी राह में तरसी!



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract