कवि और स्याही
कवि और स्याही
कभी हम लड़खड़ाये
कभी कलम डगमगाये
लिखना था क्या
लिख हम क्या-क्या डाले
अक्सर रातों को
उलाहना देती है स्याही
यूं न मेरा दुरुपयोग करो
लिखने का इतना ही शौक है तो
कुछ ढंग का लिखा करो
यूं न अल बल
जो न सो लिखा करो
फिर बताये देती हूं
तुम नहीं सुधरे तो
एक दिन हमहीं सुधर जायेंगे
छोड़ स्वर्ण रजत कलम का संग
कर बेस्याह कागज एक दिन
हम खुद हवा में घुल मिल जायेंगे।
