STORYMIRROR

Sushant Kushwaha

Abstract

3  

Sushant Kushwaha

Abstract

किधर जाएँ

किधर जाएँ

1 min
355

दुबिधा के द्वार खड़े किधर जाएँ

समेंट ले ख़ुद को या बिखर जाएँ,

आगे बढ़ें करूँ सामना हौसले से

या आँधी के पहले ही डर जाएँ,

अंधेरे सियाह रास्तों पे भटक गया

तनिक रौशनी मिले तो घर जाएँ,

वक़्त के घोड़े पर हूँ सवार

ज़रा थम जाए तो उतर जाएँ!


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract