बचपन
बचपन
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ए मन चल ज़रा झाँक मेरा बचपन
याद कर उस लम्हे को जिसमें था अमन
ख़्वाब था जब पंछियों सा उड़ने का
और उड़ते हुए छू लेने का गगन
आज ढूंढने चला है मन वो यादें
जो समय के तह में हो गया है दफ़न
याद आते ही आज बचपन जैसे
खुशी के मारे हो गयी आँखें नम
जब खेलता था बच्चों के संग मिट्टी में
माँ देखकर कितना गुस्सा होती मेरा बदन
दिन भर तितलियों के पीछे भाग-भागकर
भी कहाँ होती थी थकन
जिंदगी ला खड़ा किया कहाँ
आज ढूंढ रहा हूँ बचपन में सुखन
