खुद से बातें
खुद से बातें
खुद से बाते करते रहना अब आदत में शामिल है बस
न जाने क्यों मन ये मेरा उधड़ बुन में माहिर है बस
दोनो ही विद्यालय पढ़कर अपने अपने घर को आए
भाई बैग फेककर खेले और बहन घर को संगवाए
चूल्हा चौका , मेहमानो की जिम्मेदारी वही उठाए
हम दोनों को एक सा रखते सबको बात पसंद यही आए
मां झूठी या बातें झूठी, नादां दिल में चुभन लिए थी
है बहाव का कौन सा झरना किस दरिया का साहिल है बस
खुद से बातें करते रहना अब आदत में शामिल है बस
हर इक बात पर राय चाहिए सबसे सब पूछा जाएगा
लेकिन अंतिम निर्णय हेतु नर का चेहरा तका जाएगा
दोनों देर से लौटे लेकिन औरत से पूछा जाएगा
पूछ लिया बेटे से तो भी औरत को ही तका जाएगा
चुप रहने कि मेरी आदत ने ही मुझ पर जुर्म किया है
जिस आदत से घर बन जाए सब उस के ही काइल हैं बस
खुद से बातें करते रहना अब आदत में शामिल है बस
नर नारी हैं इक समान तो इक समान लगते क्यों नहीं हैं
एक घरेलू औरत पर क्यों व्यंग बाण थमते ही नहीं हैं
दिन भर सत्तर काम किए पर काम काम से लगते नहीं हैं
कितनी बार समझा नियति को, आंसू हैं कि रुकते नहीं हैं
जो बचपन से पाठ पढ़ाए कहीं खरे ना उतर सके वो
पढ़कर कर भी अनपढ़ बन बैठी बुद्धि इतनी जाहिल है बस
खुद से बातें करते रहना अब आदत में शामिल है बस।
