कहर
कहर
लहर है यह काले कहर की
या शुरुआत है मीठे ज़हर की?
आज तक भूली नहीं वो बात
उस रात के चौथे पहर की।
उस वक़्त ही मर चुकी थी
जब जिंदगी तेरे नाम की थी,
लेकिन वो एहसास क्यों हुआ था
जब तूने अनजाने में छुआ था?
इरादे तो नहीं थे कुछ
जान बचाने भागे थे खड़ी पूंछ,
उस सफर का जो साथ था,
कल तक गहरा राज़ था।
इत्तेफाक से जब सच आया सामने,
तो यकीन न कर पाई अपने आप में।
अपना जान कर इबादत कर ली
हकीकत मान कर सपनों की झोली भर ली।
कदम तक न बढ़ा पाई उस सड़क की ओर
एक वाकिए में खो बैठी अपनी ज़िंदगी की डोर।
क्या थी कहानी वो रात की
आज समझ आया कि:
लहर है यह काले कहर की
या शुरुआत है मीठे ज़हर की?
