STORYMIRROR

Nitu Mathur

Abstract

4  

Nitu Mathur

Abstract

कहर

कहर

1 min
185

सुलगती आग से लिपटे धुएं सी

या ठंडे बर्फ़ की गलन सी


शोला बन के जलूं या हिम सी जम जाऊं

चाहे जैसे आजमा मुझे , हर अहसास से टकराऊं,


कर ले कैसे भी आजमाइश मेरी ताकत की

ना पूछ किसी से,ना ले इजाज़त किसी की


हर परख को पार करूं में , हर दौड़ जीत जाऊं मैं

सख्त जमीं तो क्या है, अंगार का दरिया पार कर जाऊं मैं,


अब लड़नी पड़े लड़ाई या पीना पड़े काला ज़हर

बिजली बन गिरूं उन पे ,जो उठाये मुझ पे गंदी नज़र,


मैं हूं वो हवा जो नरमी से धुन में बहती जाऊं

वो चाहो बदलना रूख मेरा.....

में " कहर" बन जाऊं।


        



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract