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Kanchan Shukla

Inspirational

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Kanchan Shukla

Inspirational

कहां से कहां आ गए

कहां से कहां आ गए

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न जाने जहां को क्या हो गया ?

कहां था यह पहले कहां आ गया,

न पहले सा मंजर,

ना वह गुलिस्तां है,

बहारें न जाने कहां खो गई हैं,

न बुलबुल का गाना,

न कोयल कूं कूं,

न पेड़ों पर झूले,

न सखियों का जमघट,

न अपनो से मिलकर गले से लिपटना,

अपने पराए सब एक जैसे हुए हैं,

यह कैसा समय अब आया हे भगवन,

पहले भी सबके दिलों में थी दूरी,

पर ऐसा समय कभी आया नहीं था,

दिलों के कपट दिलों में छुपे थे,

मुंह से उन्हें कोई कहता नहीं था,

पर ईश्वर से कुछ छुपा तो नहीं था,

मानव का पाप बढ़ने लगा जब,

तब दुश्वारियां भी हमारी बढ़ने लगी,

दिलों से दिलों की जब दूरी बढ़ी,

तो ईश्वर ने ऐसा मंज़र दिखाया,

जैसा कर्म यहां करता है मानव,

वैसा ही फल उसे मिलता जहां में,

जब इंसा ने इंसा को किया दूर ख़ुद से,

तो ईश्वर ने चक्र ऐसा चलाया,

मानव से मानव की दूरी बनाई,

दिखाई फिर शक्ति मानव को अपनी,

कहते हैं ईश्वर अभी भी समय है,

संभल जा हे मानव,

मानवता दिखा फिर,

करूणा,दया, प्रेम मन में भरो तुम,

ममता की वर्षा करो तुम सभी पर,

जिस दिन से धरा पर मानवता दिखेंगी,

उसी क्षण से प्रेम सबके मन में बसेगा,

फिर से धरा दुल्हन बनेगी,

सब की आंखों में खुशियों का मंज़र दिखेगा,

बहारों की डोली उठेगी जहां में,

कारवां लाशों का फिर दिखाई न देगा,

जो दुनिया में आया है वह जाएगा इक दिन,,

उसे फिर से अपनो के कंधे मिलेंगे,

दिलों में सभी के प्यार जागेगा फिर से,

होली दीवाली साथ सबके मनेगी,

तुमने जो गलती कर दी है पहले,

उसको दोबारा कभी नहीं करना,

मैंने बनाई थी रंगीन दुनिया,

तुमने सभी रंग फीके किए हैं,

अपनी गलती सुधारो यह संकल्प लो तुम,

यह धरती है माता मान इसका करेंगे,

इसके आंचल में जो रत्न बिखरे हुए हैं,

उसकी सुरक्षा हम मर कर करेंगे।।



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