STORYMIRROR

Ajay Prasad

Abstract

3  

Ajay Prasad

Abstract

कबूल हो जाए

कबूल हो जाए

1 min
314

बस इक दुआ कबूल हो जाए

फ़िर चाहे सब फिजूल हो जाए।


जो ढा रहे हैं ज़ुल्म मजलूमों पर

ज़िंदगी उन की बबूल हो जाए।


मदद न सही तो मक्कारी भी नहीं

अमीरों का बस ये उसूल हो जाए।


भटक रहे हैं लोग बदहवास जहां में

या खुदा और एक रसूल हो जाए


मूंद लूँ मैं आँखें इत्मीनान के साथ

गर मेरी ये इल्तिज़ा कबूल हो जाए।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract