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KAVY KUSUM SAHITYA

Abstract

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KAVY KUSUM SAHITYA

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कातिल निगहें

कातिल निगहें

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तेरी तिरछी नजरे कातिलाना इंसान कि

चाहत तेरी नजरों से कत्ल हो जाना।           

तेरे गालों कि लाली सुबह सुर्ख सूरज का

शर्माना जमाने का अंदाज़ है आशिकाना।     


हवाओं में उड़ाती जुल्फे कभी चहरे का हिजॉब कभी

सावन कि घटाओं का शबाब बहारों के मौसम का शर्माना।      

रौशन शमां ढलती शाम में चाँद कि

चाँदनी का अफ़साना परवानो का जल जाना।       


हसरत हुस्न कि तू, इबादत इश्क कि

तू इन्सान के ईमान का बहक जाना।                

हर दिल कि चाहत है हर हस्ती कि दौलत है

हर सांसों कि धड़कन है हर किसी को मचल जाना।     


ना चांदी जैसा रूप है तेरा, ना सोने जैसे बाल,

तू तो इंसान के नसीब का नज़राना।       

दिलों की गहराई है तू दिलों कि चाहतों में उठती तूफां,

हर दिल कि चाहत है समन्दर में समा जाना।               


शोला भी है तू ,शबनम भी है तू कोई

आहें भरता है कोइ चाहता है जल जाना।               

तू मशहूर है ,मगरूर नहीं, तू इकरार है

इनकार नहीं तेरी चाहतो कि चाहत मिट जाना।      


शाकी भी है तू,पैमाना भी है तू, मैख़ाना भी है तू,

देखे एक नज़र जो कोइ तुझको बिन पिए बहक जाना।                

बहारों की मल्लिका है, किस्मत का करिश्मा है,

किसी की जिंदगी है तू किसी कि चाहतो का ख्वाब।


जानेजाना प्यासी काली सावन कि सागर के

इन्तज़ार दरिया के इश्क समंदर में है मिल जाना।                


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