जय जगन्नाथ
जय जगन्नाथ
चारों दिशा से आए कवि, एक ही धाम में,
शुभकामनाओं के दीप जले, कविता के नाम में।
पर हर हृदय में, हर स्वर में, एक ही ख्याल है,
हमारे प्रभु जगन्नाथ हैं, जो सबका रखवाल हैं।
कलम चले तो पहले, उनको ही प्रणाम है,
शब्दों में गूंजता वही, एक ही नाम है।
युगों-युगों से पुरी में, जो सिंहासन पर विराजे,
भक्तों के दुख हरने को, नीलाचल में साजे।
न वो राजा न वो रंक, सब उनके प्यारे हैं,
जो भी द्वार पर आए, वो सब उनके सहारे हैं।
