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Ajay Singla

Inspirational

4  

Ajay Singla

Inspirational

ज्ञानी / अज्ञानी

ज्ञानी / अज्ञानी

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कोई कहे कि मैं ज्ञानी हूँ 

जानता मैं परमात्मा को भी 

जन्म मृत्यु के पार जा चुका 

छोडी इच्छायें व्यर्थ जो सभी।


अज्ञानी को अब पाठ पढ़ाऊँ 

ताकि वो भी ज्ञानी हो जाए 

दुःख दूर हों इस दुनिया के 

संसार सुखी, दानी हो जाए।


मैं मानूँ ज्ञानी वो जो मान ले 

सकल ये दुनिया है अज्ञानी 

मान ले कि उसको भी ज्ञान नहीं 

ये ब्रह्माण्ड एक अजब कहानी।


कहता कोई जो समुंदर अतल है

अथाह, गहरा कहे दूजा कोई 

ये तो बस कहने की बात है 

किसी ने भी उसे नापा तो नहीं।


पक्षी, जीव हैं सब रहस्यमय 

क्या कोई इन सबको जान सका 

विज्ञानी भी कुछ हद तक जा सकें 

उसके बाद बस चले ना उनका।


रोज़ सुबह है सूरज दिखता 

रात में चाँद तारे आ जाते 

आकाश गंगा ना जाने कितनी 

लाखों ब्रह्माण्ड हैं इस आकाश में।


क्या किसी को इसका ज्ञान है 

कहाँ से आते, इन्हें कौन बनाता 

नित्य नए तारे बन रहे 

हर पल में एक टूट है जाता।


कोई ना जान सके इस रहस्य को 

इतना अनंत, असीम है ये तो 

बुद्धि बस एक अंश ही जान सके 

पूरा कभी जान सके ना इसको।


दुःख का कारण अशिक्षा कहते थे 

अब शिक्षित सारा संसार है 

आकांक्षाएँ बढ़ाईं शिक्षा ने 

नही किया सुख का विस्तार है।


मंदिर में एक अनपढ़ नाच रहा 

देख के मन मेरा ललचाया 

द्वेष मुझे उससे हो रहा 

उसकी तरह मैं नाच ना पाया।


शायद अड़चन थी यहाँ ज्ञान मेरा 

क्या खुश हैं ज़्यादा अज्ञानी 

उत्तर इसका बस यही मिला 

पढ़ने से होता ना कोई भी ज्ञानी।


बच्चा पूछ रहा पिता से 

धरती को बनाया किसने 

पिता कहे प्रभु ने बनाया 

उसे किसने, पुत्र पूछे ये।


अटक गया, उत्तर ना मिला 

पहले ही कह देते, ना जानता 

किसने बनाया धरती को, प्रभु को 

खोज रहा अभी उत्तर इसका।


बड़े होकर तुम भी खोजना 

जिसे पहले उत्तर मिल जाए 

जो समझ ले इस पहेली को 

वो फिर दूजे को बताए।


श्रद्धा उसकी होगी फिर तुम्में 

अगर मान लो अज्ञानी तुम हो 

जो ना जानो, मान लो तुम वो 

यही ज्ञान तुम देना उसको।


मैं मानूँ ज्ञानी वही है 

जान गया जो कि संसार ये 

इतना असीम और अपार है 

कोई भी इसको ना जान सके।


ना कोई ज्ञानी, ना अज्ञानी 

एक नज़र का फेर है ये तो 

प्रभु का पार पा सके ना कोई 

ज्ञानी वो, जो माने अज्ञानी वो।


अज्ञानी मैं मान लिया जिसने 

ज्ञान की धारा उसमें फूटी 

मैं ज्ञानी, जो ये कह रहा 

सबसे बड़ा अज्ञानी है वही।


मैं ज्ञानी, मेरा ज्ञान बड़ा है 

विमुख करा दे परमात्मा से 

और यही अभिमान ज्ञान का 

आत्मा से हमें मिलने ना दे।


मैं, मेरा ने जग भरमाया 

क्या ये मैं छूटेगी मेरी 

परमानन्द मैं पाना चाहूँ 

इसी मैं से ही हो रही देरी।


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