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Babu Dhakar

Abstract

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Babu Dhakar

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जलते हैं

जलते हैं

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जलते हैं रहते जो एक दूसरे से

रस्ते में रहते सिर्फ हाथ मलते

हमें बतायें दिवारों से मकान होते हैं

पर दिवारों से ही मतभेद होते है ।

दिवारों के कान में कहते हैं

सहारों के साथ में आजाद कहते हैं

जलते हैं मां बाप से अपने 

और ऐसा क्या किया आपने कहते रहते हैं ।

बहते बहते पानी के बहाव में 

एक तिनका जैसे तैरता रहता है

जब सहते सहते जीवित रह लेते

फिर कहना क्या किसलिए जलते हैं ।

जो जलते हैं फिर भी अकड़ते हैं

जो बरसते हैं क्या वो गरजते हैं

जो गरजते या जलते हैं वो तरसाते हैं

एक दिन स्वयं अवश्य तरसते हैं ।

कोई तो जलेगा और अंगार बनेगा

पानी का छिडकाव क्या कुछ असर करेगा

मजबूर अंगार स्वयं तक सिमट जाता है

अंत में केवल राख बन रह जाता है ।

मजबूर अक्सर भावनाओं में रहते हैं

मजबूत जलने वालों को स्वयं से अलग करते हैं

जलन देखकर हमें अपनी दिशाओं को बदलना हैं

चलन राहों के हमारे में हमें सबके साथ रहना हैं ।

 

यूं ही जलते हैं पर कहते हैं

यूं ही जलते हैं पर सहते हैं

यूं ही जलते हैं पर संग रहते हैं

यूं ही जलते हैं जो फिर भी चलते हैं ।


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