जीवित श्राद्ध
जीवित श्राद्ध
श्राद्ध श्रद्धा का भाव है,व्यवहार है, श्राद्ध औपचारिकता नहीं, न ही रस्म-रिवाज निर्वाह!! श्राद्ध है पितृ-ऋण, पितरों का आभार, पितृ-पक्ष में पितरों का अभिनंदन, सत्कार!! श्राद्ध संबंध, संवेदना, पावन स्मृति, संस्मरण, सनातन सत्य का सत्यार्थ!! श्राद्ध शिष्ट शिष्टाचार, अतीत के आलंबन का* अभिनंदन, सत्कार!! कुल-मर्यादा, परिवार, समाज,धर्म का गुरुतर मर्म-निर्वाह!! पर आज वर्तमान समय में श्राद्ध न श्रद्धा रहा, न विश्वास!! माता-पिता जीवन का सब कुछ न्योछावर कर देते कुल गौरव हो संतान!! स्वयं की इच्छाओं का दमन कर,सारे यत्न, जतन, प्रयत्न करते कुल-भूषण बने संतान!! सच में होता भी यही माँ-बाप की त्याग- तपस्या से संतान कुल गौरव, कुल-भूषण बनती है! संतान!! माँ-बाप गर्व से इतराते माँ के आँचल का राज- दुलारा,अरमान!! पिता के कंधों का सिंहासन,दुनिया में सफल, सौर्य-प्रताप!! बढ़ती उम्र, ढलती शाम, जीवन का शनै:-शनै: अवसान!! बृद्ध वेदना में सच्चा सहाराही तो है संतान!! संतानों की चाहत समय-काल है उनका, क्यों न चढ़े? सफलता के सोपान, आकाश!! माता-पिता और संतानों में पीढ़ी-अंतर का सोच, आचरण, द्वन्द पर्याय!! धीरे-धीरे माँ-बाप की आँखों का राज-दुलारा दुनिया की भौतिकता की चकाचौंध में कहीं खो दूर बहुत निकल जाता!! बूढ़ी आँखें नज़रें खोजती हैं,नज़र नहीं आता संतान!! माँ-बाप की सेवा संतान कि भी चाहत उनकी आशाओं का आकाश बने!! दुनिया की दौड़ में, प्रतियोगिता, प्रतिस्पर्धा की होड़ में,विवश, बेबस,लाचार!! करे भी तो क्या?* कहीं आगे निकलने की दौड़ में पिछड़ेपन क न लग जाए ना दाग!! यही सच्चाई है आज की पीड़ा,माँ-बाप की व्यथा कथा,वर्तमान समाज की!! माँ-बाप को छोड़ अकेला पत्नी और अपनी संतान के साथ,मोबाइल के दूरभाष से जनता कुशल क्षेम हाल चाल!! उसे पता है सुखी रहने का,माँ-बाप का आशीर्वाद जन्म-सिद्ध अधिकार!! अब तो यह भी होता है माँ-बाप को वृद्धाश्रम छोड़ आती है संतान!! श्राद्ध-श्रद्धा की इतिश्री, जीवित श्राद्ध यही है प्रमाणित प्रमाण!! नन्दलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर गोरखपुर, उत्तर प्रदेश -
