PRATAP CHAUHAN
Abstract Classics Inspirational
सम्मान, समर्पण भारत का।
जरा मान करो परमारथ का।।
अर्पण वीरों के साहस का।
सम्मान करो रण पारथ का।।
वीरों की फर्ज शहादत का।
जरा अदब करो निस्वारथ का।।
कंचन काया रज सारथी का।
सम्मान करो मां भारती का।।
ठिठुरन वाली
सहस्र वनिता
ओमकारा
पर्यावरण बचाए...
दुल्हन बन दुख...
इंसानियत
आजादी की बाते...
प्यार को पाकर
ताल मृदंग बजा...
भारत ने ख्यात...
पतझड़ में झड़ गए पत्ते सारे सूखी शाख पर लगी है आग। पतझड़ में झड़ गए पत्ते सारे सूखी शाख पर लगी है आग।
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अयोध्या लोटे सीता और दोनो भाई, ऐसा आनंद था छाया, मंगल गीत और ढोल नगाड़े , उत्सव था जैस अयोध्या लोटे सीता और दोनो भाई, ऐसा आनंद था छाया, मंगल गीत और ढोल नगाड़े , उत्...
हौसलों की उड़ान में,इरादों को मकसद बनाकर तो देखो। प्रगति पथ पर तुम, हिम्मत से कदम उठाकर तो देखो। ... हौसलों की उड़ान में,इरादों को मकसद बनाकर तो देखो। प्रगति पथ पर तुम, हिम्मत से ...
नहीं मिलेगा कहीं नहीं मिलेगा, जहां तुम हो बस वही मिलेगा। नहीं मिलेगा कहीं नहीं मिलेगा, जहां तुम हो बस वही मिलेगा।
फिर मत कहना, समय रहते ... मैंने कहा नहीं ! फिर मत कहना, समय रहते ... मैंने कहा नहीं !
क्यों की न हम कभी सृष्टि को कुछ दे पाये हैं, और न कभी कुछ दे पायेंगे और न कभी कुछ दे पायेंगे ! क्यों की न हम कभी सृष्टि को कुछ दे पाये हैं, और न कभी कुछ दे पायेंगे और न कभी...
बस खाना - डरना और जनना, इतने में ही, इंसान क्यों पड़ा है? बस खाना - डरना और जनना, इतने में ही, इंसान क्यों पड़ा है?
नदी-सा बहना सीखो कहते चतुर सयाने, पर बहाव में ही अस्तित्व कोई यह न माने... नदी-सा बहना सीखो कहते चतुर सयाने, पर बहाव में ही अस्तित्व कोई यह न माने...
मेरा संसार जहां सुबह जैसी सुबह है और शाम जैसी शाम है। मेरा संसार जहां सुबह जैसी सुबह है और शाम जैसी शाम है।
रिश्तों के आधार की, दरक रही है नींव। समय चक्र के खेल में, भटक गए सब जीव।। रिश्तों के आधार की, दरक रही है नींव। समय चक्र के खेल में, भटक गए सब जीव।।
हल्दीघाटी पावन धाम पे हर कोई शीश नवाता है हल्दीघाटी पावन धाम पे हर कोई शीश नवाता है
समय किसी के हाथ न आया समय की है अजब ही माया इसके आगे हर कोई झुकता समय किसी के लिए न रुकता। समय किसी के हाथ न आया समय की है अजब ही माया इसके आगे हर कोई झुकता समय किसी के...
ए `प्राण` बुढापे का निरादर नहीं करना इक रोज़ हरिक शख्स को आता है बुढ़ापा। ए `प्राण` बुढापे का निरादर नहीं करना इक रोज़ हरिक शख्स को आता है बुढ़ापा।
इस समय त्योहारों का मौसम चल रहा है पर साथ ही लोकतंत्र का भी। इस समय त्योहारों का मौसम चल रहा है पर साथ ही लोकतंत्र का भी।
ममता कातर गाय दिखा गयी एक राह रथ के आगे खड़ी हो बता गयी थी चाह ममता कातर गाय दिखा गयी एक राह रथ के आगे खड़ी हो बता गयी थी चाह
प्रभु मूरत देख कर देवता अयोध्या में रहे, ये करें विचार। प्रभु मूरत देख कर देवता अयोध्या में रहे, ये करें विचार।
शृंगार बालों का हुआ है, झूलती है चोटियाँ। चकले थिरक जाते खुशी से, बेलती जब बेटियाँ। शृंगार बालों का हुआ है, झूलती है चोटियाँ। चकले थिरक जाते खुशी से, बेलती जब बे...
आज भी वे कविताएं अपनी गूँज लिए रसोई में रहती हैं जहाँ माँ कविता बनाया करती थी। आज भी वे कविताएं अपनी गूँज लिए रसोई में रहती हैं जहाँ माँ कविता ...
ममता की प्रतिमूर्ति ऐसी, देवी छोटी पड़ जाती है, धरती पे माँ कहलाती है। ममता की प्रतिमूर्ति ऐसी, देवी छोटी पड़ जाती है, धरती पे माँ कहलाती है।