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ridhi Jain

Tragedy

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ridhi Jain

Tragedy

इंसाफ़

इंसाफ़

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सुबह की किरण ना जाने आज मेरे लिए क्या लाने वाली थी,

हसंती खिलती मेरी मुस्कान आज आँसुओं में बदलने वाली थी।

जल्दी आने का वादा हर रोज़ आज भी किया,

पर आज क़िस्मत की लकीरों में था कुछ और ही लिखा हुआ।।


रात में अंधेरा इस तरह था आसमान में छाया,

निडर आँखों ने भी मेरी आज पलक अपना झपकाया।

क़रीब उन्हें आते देखकर दिल मेरा घबराया,

आज मेरी रक्षा करने के लिए ना पापा थे ना उनका साया।। 


ज़िंदगी कुछ मिनटों में  यूँ बेरंग से हो गयी,

ना होश ना आवाज़, मेरी जान मुझसे खो गयी।

मेरे जलते बदन की खबर कल सामने आएगी,

देश की एक और बेटी मौत के घाट उतारी जाएगी।।


पूछना तुम उन दरिंदो से क्यूँ खेला ऐसा खेल,

रह गया था करना अभी ज़िंदगी से बहुत सा मेल।

अभी पापा से सीखनी थी और चार बातें,

अभी माँ की गोदी में थी काटनी थोड़ी और रातें।।


मेरे जाने के बाद मेरे माँ-बाप को संभाल लेना,

मुझे मेरे हक़ का इंसाफ़ ज़रूर दिला देना।

ना डाले एक और मासूम की इज़्ज़त पर कोई हाथ,

ऐसे दरिंदो की गंदगी को तुम सब मिलकर कर देना साफ़। 



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