STORYMIRROR

Dheeraj Kasturi

Abstract

3  

Dheeraj Kasturi

Abstract

इंसानियत गुमनाम

इंसानियत गुमनाम

1 min
187

अनजान है ये जगह, दुनिया हैं इसका नाम

कहीं होती है सुबह, कहीं होती है शाम


मुसाफिरों की ये ठिकाना है, पर सब के है कुछ काम

बस मेहनत करने वालों को जीत हैं, बाकी हैं बदनाम


पेड़, बगीचे, जीव-जंतु बहुत देखे है हम

पर इंसान तो कहीं नही और इंसानियत गुमनाम


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract