इंसान और बेजुबान: वफ़ा की असलियत
इंसान और बेजुबान: वफ़ा की असलियत
इंसान और बेजुबान: वफ़ा की असलियत इंसान की महफ़िल में गया, तो बस सौदेबाजी पाई, रिश्तों की चादर ओढ़े यहाँ, हर शख्स है हरजाई। हाथ मिलाया जिसने भी, उसने ही पीठ दिखाई है, इंसान की फितरत में शायद, धोखे की परछाईं है। शायरी: "बड़े सलीके से तोड़ते हैं दिल, यहाँ वफ़ा की बात करने वाले, इंसान ही निकलते हैं अक्सर, इंसान का बुरा चाहने वाले।" अब जरा उस दर पर बैठे, वफ़ादार को देख लेना, मालिक की एक डाँट पर भी, उसका प्यार देख लेना। उसे नहीं मतलब तुम्हारी दौलत, या तुम्हारे नाम से, वो बस जुड़ा है रूह से, और वफ़ा के काम से। शायरी: "इंसान तो बदल जाता है, अपनी सहूलियत के हिसाब से, पर कुत्ता वफ़ा निभाता है, मालिक के नसीब के हिसाब से।" इंसान भूल जाता है, किए हुए हजार एहसानों को, पर कुत्ता याद रखता है, उम्र भर पुरानी यादों को। मालिक अगर भूखा सोए, तो वो भी नहीं खाता है, इंसान तो अपनों का भी, हिस्सा हड़प जाता है। शायरी: "वफ़ा की किताब में जब भी, वफादारी का नाम आया, इंसान तो पीछे रह गया, पर एक कुत्ता काम आया।" वो पूछ नहीं हिलाता, वो अपना दिल दिखाता है, इंसान तो मीठी बातों से, बस जाल बिछाता है। इंसान की वफ़ा तो बस, धूप और छाँव जैसी है, पर जानवर की मोहब्बत, एक गहरी छाँव जैसी है। शायरी: "सीखनी है वफ़ा तो, उस बेजुबान की आँखों में झाँको, इंसान के चेहरे तो अक्सर, नकाबों में छिपे होते हैं।" क्या आप चाहते हैं कि मैं इस कविता के लिए एक बहुत ही गहरी और इमोशनल फोटो बना दूँ, जिसमें एक इंसान और
