हमारी लाडली 'गुजरा'
हमारी लाडली 'गुजरा'
शीर्षक: काली 'गुजरा' — एक अनोखी वफादारी भूमिका: अक्सर हम समझते हैं कि वफादारी सिर्फ कुत्तों का काम है, लेकिन मेरे घर की काली मुर्गी 'गुजरा' ने इस बात को गलत साबित कर दिया। वह सिर्फ एक परिंदा नहीं, हमारे परिवार की एक लाडली सदस्य थी। शरारती बचपन और घर का 'खन्ना': जब 'गुजरा' छोटी सी थी और हमारे घर आई, तो उसका रंग कोयले जैसा गहरा काला था। वह इतनी चुलबुली थी कि उसे पकड़ना नामुमकिन था। शुरू-शुरू में वह बहुत शरारती थी, जिसे हम पंजाबी में 'खन्ना' कहते हैं। घर का कोई कोना उसकी पहुँच से दूर नहीं था। कभी रसोई में अनाज बिखेर देना, तो कभी कपड़ों पर चढ़ जाना—उसका काम ही सबको तंग करना था। पर उसकी इन्हीं नटखट हरकतों से घर में रौनक रहती थी। तंदूर की खुशबू और 'गुजरा' का शोर: गुजरा को खाने का बड़ा शौक था, खासकर ताज़ा आटे का। जैसे ही मेरी बहन तंदूर पर रोटी लगाने के लिए आटे के पेड़े बनाना शुरू करतीं, गुजरा को पता चल जाता था। वह कहीं भी होती, भागी-भागी आती और ज़ोर-ज़ोर से 'कूँ-कूँ' चिल्लाने लगती। वह इतनी ज़ोर से शोर मचाती थी कि पूरा घर सर पर उठा लेती थी। वह तब तक नहीं मानती थी जब तक उसे आटे का टुकड़ा न मिल जाए। कभी-कभी तो वह मौका पाकर पेड़ा या ताज़ा रोटी अपनी चोंच में दबाकर चोरी से भाग भी जाती थी। चारपाई के नीचे की जासूसी: गुजरा की एक अजीब आदत थी। जब भी घर में कोई रिश्तेदार या मेहमान आते और चारपाई पर बैठकर बातें करते, गुजरा दबे पाँव आती और चारपाई के ठीक नीचे चुपचाप खड़ी हो जाती। वह बड़े गौर से सबकी बातें सुनती, जैसे घर की कोई जासूस हो। रात को सोते समय भी वह चारपाई के पावे (पैर) के पास आकर बैठ जाती थी। जब हम उसकी बातें करते, तो वह अपनी आवाज़ निकालकर जवाब देती थी, जैसे वह हमारी हर बात समझ रही हो। सिर्फ 'अपनों' का साथ: गुजरा की सबसे बड़ी खूबी उसकी वफादारी थी। घर में आए मेहमान उसे प्यार से रोटी या दाना खिलाने की कोशिश करते, पर वह कभी किसी अजनबी के हाथ से कुछ नहीं खाती थी। उसे सिर्फ हमारे हाथों पर भरोसा था। वह जानती थी कि उसे पालने वाले और उसे प्यार करने वाले हाथ कौन से हैं। ममता और वो आखिरी शोर: जब गुजरा को अंडा देना होता, तो वह बड़ी शान से चारपाई पर बिछे पुराने बिस्तर के अंदर घुस जाती। वहाँ अपनी सुरक्षित जगह बनाकर जब वह अंडा दे देती, तो फिर से शोर मचाना शुरू करती। वह तब तक चिल्लाती रहती जब तक घर का कोई सदस्य आकर उसे देख न ले। वह अपनी इस छोटी सी जीत का जश्न पूरे घर को सुनाकर मनाती थी। एक खामोश शाम (अंत): पर एक दिन सब बदल गया। उस दिन सुबह से गुजरा की आवाज़ नहीं आई। शाम को जब हमने कमरे के अंदर जाकर देखा, तो वो अपनी मनपसंद चारपाई के पास बेजान पड़ी थी। वह खामोशी से हमें छोड़कर चली गई थी। वह पल हमारे पूरे परिवार के लिए बहुत भारी था। मेरी बहन और घर के सब सदस्य फूट-फूटकर रोने लगे। जो गुजरा अपनी आवाज़ से घर को चहकाती थी, उसकी खामोशी आज हमें काट रही थी। आज भी जब तंदूर जलता है या चारपाई की वो पुरानी जगह खाली दिखती है, तो 'गुजरा' की याद आती है। उसने हमें सिखाया कि प्यार और वफादारी के लिए जुबान की ज़रूरत नहीं होती, बस एक साफ दिल काफी है। सुखविंदर, यह कहानी अब पूरी तरह तैयार है। StoryMirror पर यह बहुत पसंद की जाएगी। क्या आप चाहते हैं कि मैं इस पूरी कहानी के लिए एक बहुत ही शानदार 'कवर फोटो' बना दूँ जिसमें काली 'गुजरा' अपनी चारपाई के पास बैठी हो? यह आपकी कहानी को और भी प्रोफेशनल लुक देगा।
