STORYMIRROR

Rivaayat .

Abstract Romance Others

4  

Rivaayat .

Abstract Romance Others

इनायत

इनायत

1 min
384

ज़िंदगी की हर याद को न जाने, 

किस कोने में संजो दिया।

न जाने कितनों को ढूंढ़ते ढूँढ़ते 

मैंने या।


उसका नाम ही मेरी आयत था 

उसका इंतज़ार मेरी रवायत।

उस मेहजबीन की रौशनी में न जाने कब 

मैंने अपनी परछाई को खो दिया ।


दिन में राह देखते देखते 

रात में आंसू बहा देते 

हर अधमरी रात में खुदा से 

बस एक नयी सेहर मांग लेते


रेत की गुड़िया होकर तूफ़ान को न्योता दिया,

अब बरसात में भीगना बाकी है।

पत्थर का टुकड़ा होकर बेहार से शर्त लगाई,

अब तैरना सीखना बाकी था।


खुद से ही लड़कर हार गयी, तो जाना 

सुकून तो अंदर ही मिलना है।

अल्हड़ दरिया को भी आखिरकार 

शांत समंदर ही बनना है।


तुम्हें ढूँढ़ते ढूँढ़ते खुद को खो देना 

गलती नहीं, नवाज़िश है।

जुदा कर, फिर राह मिला देना 

यही क़ुदरत की साज़िश है।


गुज़ारिश बस इतनी की तुम खुद को ढूंढ लो 

खुदा को मनाना मेरी मेहनत है।

और अगर इस सफर में गुमशुदा भी हो गए 

तो भी, हर सांस.... हर समेटी याद... 

सिर्फ खुदा की रहमत है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Rivaayat .

Similar hindi poem from Abstract