हरी कांच की चूड़ियां
हरी कांच की चूड़ियां
तुम्हें याद हो के न हो
मगर मुझे याद है
सावन के आने पर
भेजी थी तुमने
हरी कांच की चूड़ियां
बगैर तुम्हारे
पहन ली थी मैंने वो चूड़ियां
मेहँदी भी लगवाई थी
और झूले पर झूली भी थी
बगैर तुम्हारे ....
और तुम सीमा पर तैनात
सुन रहे थे ग्रेनाइट की गड़गड़ाहट
झेल रहे थे गोली बारूद की बरसात
भींग रहे थे संगी साथियों के लहू से
मुकाबले के जुनून में तल्लीन....
सभी से बेखबर अपना मोर्चा संभाल रहे थे
एक चूड़ी के चटक जाने से तब
जान निकल गई थी मेरी
आज भी याद है वो मंजर .....
फिर सावन आया है
डाल दिए गए हैं झूले
सज गई हैं दुकानें
हरी कांच की चूड़ियों से
मेहँदी की खुशबू से
गूंज उठा है ब्रह्मांड
दुल्हनों की हंसी ठिठोली से।
