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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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हमारा जादू

हमारा जादू

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हमारा जादू हमारे सिर पर

चढ़ कर बोल रहा है

और चुम्बकीय अफवाहों की

दीवार भरभराकर गिर रही है

हमारा बनकर हमें लूटने का

प्रबंध बेनकाब हो रहा है

अब उस संदेह का क्या करें

जो हमे हमारे विरुद्ध देखने का है

यकीनन हम अपने हैं

और हमें अपनी सभ्यता से

अपने देश से,अपने निजाम से

और खुद से,बेहद प्रेम है।

जितना अच्छा लगता था

अपने स्वर्णिम इतिहास की याद

उससे अधिक अच्छा लग रहा है

हमारा, खुद सा बनना

खुद से मिलना

खुद से बात करना

और अराजकता के सम्मोहक जंगल मे

खुद के बनाये हुये रास्ते पर चलना।


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