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Mamta Singh Devaa

Abstract

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Mamta Singh Devaa

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हमारा बचपन

हमारा बचपन

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हमारा बचपन सिर्फ हमारा नही था

परिवार - कॉलोनी भर सबका था

और ना जाने कितनों का था ,


हमारी हर बात पर सब राय देते थे

हम उनकी राय पर ज़रा भी मुँह नही बनाते थे

उनकी राय को हम सब सर-माथे लेते थे ,


जब भी कोई बड़े घर आते या बाहर मिल जाते

रिश्तों से अनजान लपक कर पैर छूए जाते

हम झोली भर कर आशीर्वाद साथ ले आते ,


खाने के वक्त किसी के भी घर पहुँच जाते थे

प्रेम से सबके साथ हम भी खिलाये जाता थे

फिर आना कह कर बड़े प्रेम से बुलाये जाते थे ,


सिर्फ अपने अपने नही होते थे सबके होते थे

चाची-ताई , बुआ-मामा , दादी-दादा जो भी थे

मेरे उनके होते और उनके हम सबके होते थे ,


शादियों में दिनों पहले सब इकठ्ठे होते थे

सारे काम पल भर में झट से बंट जाते थे

हँस कर प्रेम से चुटकियों में सब हो जाते थे ,


गर्मियों की छुट्टियां सच की छुट्टियां होती थीं

ना होमवर्क मिलता ना कोई चिंता होती थी

लूडो - कैरम और ताश की बाजियां जमती थीं ,


अपने बेड और अपने रूम से अनजान थे

जहाँ नींद आई वहीं पैर फैला लुढ़क जाते थे

नींद में बड़बड़ाते हुये भी चैन की नींद पाते थे ,


सूरज ढ़लते ही चाट वाला तवे बजाता आता था

किसी मुँह में पानी किसी को स्वाद दे जाता था 

हम सबको उस चाट का स्वाद बहुत भाता था ,


लाईट जब भी जाती सबकी मौज हो आती थी

पूरी कॉलोनी में आईस-पाईस खेली जाती थी

पकड़े जाने पर 'धप्पा' की आवाज़ आती थी ,


अकेलेपन का ना तो तब कोई भी खेल था

आपस मेंं मिल कर रहना ही बस मेल था

घर में रहने पर तो घर घर ना होकर जेल था ,


त्योहारों पर सब आपस में मिलते - जुलते थे

सबके हाथों के पकवानों का स्वाद लेते थे

फिर अपने घर भी आने का न्योता देते थे ,


कैसे टेलीफोन पर बार-बार नम्बर घुमाते थे

घुम-घुमा कर सबके नम्बर याद हो जाते थे

ये नम्बर हमारी याददाश्त अच्छी कर जाते थे ,


कैसे अख़बार में रोल नम्बर देखे जाते थे

नही मिलने पर बार-बार देखने को कहते थे

पास होने की सब मिल कर खुशियां मनाते थे ,


वक्त वो जो बीत गया एक मीठा सपना था

वक्त वो हम सबके करीब हमारा अपना था

वक्त वो आज भी जैसे सुनहरी कल्पना था ,


बीते वक्त के खजाने से कितनी यादें निकालूँँ

चलो इसी बहाने उनको एक-एक कर संवारूँ

आँखों में बसा कर लाडले जैसा ही निहारूँ ।



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