हैरान धरती
हैरान धरती
मानव ये क्या कर दिया तूने, इतना निर्मोही कैसे हो गया
न तूने अपना भला देखा, न ही दूसरों का ही भला देखा
लोभ में इस कदर बाबला हुआ कि प्रकृति को न बख्शा
अधिकार जमाना चाहा अपनी धरती पर तूने मनमाना
देख तेरी मनमानी का हस्र ये, धरती भी लगी अब डोलने
कल तक तू सोचता था सर्वस्व राज करूंगा धरती पर
वक्त है ये आज तुम कैद और पक्षी उन्मुक्त गगन तले हैं
करनी भुगतनी पड़ती है अपनी अपनी यहां सभी को
धरती को यूँ तुम प्रदूषित न करते और स्वच्छ रखते इसे
आज मास्क न पहनना पड़ता न यूँ मुँह ढ़ककर चलते।
