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VEENU AHUJA

Abstract

4.8  

VEENU AHUJA

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गूंजे सकल विश्व में वाणी

गूंजे सकल विश्व में वाणी

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478


गूँजे गूंजे सकल विश्व में वाणी तुम्हारी।

क्यों हो इतने हताश , जीवन से निराश,

स्पर्श से तुम्हारे स्पंदित धरा , सारांश तुमसे ही है सारा।


अकेले नहीं हो तुम,सकल विश्व तुम्हारे साथ,

सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ कृति , सहेज साहस , बढ़ो , साधन के साथ।


दृढ़ संकल्प प्रेरक तुम्हारे , आत्म विश्वास पूंजी तुम्हारी,

जलाओ अलख विद्या की , निशंक गगन चुमेंगी सफलता तुम्हारी ।


आत्म हत्या नहीं है उचित उपाय , असत्य तुम्हे यूं ही भरमाए।

क्या है जो तुम पा सकते नहीं , कहां है , जहां तुम जा सकते नहीं,


चांद से पार दृष्टि तुम्हारी , निर्भीक , दूर तक जाएंगी, कहानी तुम्हारी,

तुम सुनो सबकी , सब सुने तुम्हारी , करो जतन , गूंजे सकल विश्व में वाणी तुम्हारी।।


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