गली वाला मकान
गली वाला मकान
जो गुमनाम था,
उसे बदनाम कर दिया मैंने,
उसकी आबादी के चक्कर में,
ख़ुद को बर्बाद कर दिया मैंने।
लोग हँसते रहे मेरी मजबूरियों पर,
अरे उधर देखो,
किसी का काम तमाम कर दिया मैंने।
उसने कहा उसकी मजबूरी थी,
मैंने कहा तेरी नीयत बुरी थी,
उसके सब उधारों का,
हिसाब किताब कर दिया मैंने।
रोज़ छत पर चढ़ कर उससे मिल आता था,
कभी कोई ना हो तो घर में भी घुस जाता था,
वो तो चली गयी किसी और के घर,
उसके घर को पूरा नाप लिया मैंने।
लिखा करती थी कितना चाहती है मुझे,
बताए करती थी मिलना चाहती है मुझे,
अब इन ख़तों का क्या करूँ मैं,
एक दिन इन ख़तों को ही ख़ाक कर दिया मैंने।
अब तेरा दिया मेरे पास कुछ भी नहीं,
और जो तेरे पास है उसमें अब मेरा कुछ नहीं,
अब चाहे तो आ छत पर जब आए घर,
अब उस गली वाला मकान छोड़ दिया मैंने।

