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Dr Kavita Singh Prabha

Abstract

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Dr Kavita Singh Prabha

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घर

घर

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आँगन, तीन कमरे और दालान की दीवार 

यही तो था हमारा शानदार राज दरबार। 


हमारे सपनों से सजा डेरा बहुत न्यारा था, 

जिसमें रहती थी वो घर-द्वार बहुत प्यारा था।


माँ मेरी ज़मीन तो पिता छत बन गए, 

दो भाई मेरी दुनिया के स्तंभ बन गए। 


उस आँगन में स्नेह खिलखिला कर हँसता था, 

उस पुराने से घर में दो जहान बसता था।


माँ गर्म-गर्म भोजन नहीं, ममता परोसती थी,

सिर पे हाथ फिरा के आशीष दिया करती थी।


पिता की गंभीर मुद्रा से मैंने दृढ़ता सीखी,

उनकी कुशल कार्यशैली से कर्मठता सीखी।


अनमोल ख़ज़ाना है वो मेरी यादों का,

बेशकीमती नज़राना है वो जीवन का।


भागते-दौड़ते पेड़ों की डालियों पे झूल जाना, 

उछलते-कूदते कभी कहीं ठोकर खा जाना।


न चोट का डर था, न ज़माने से शिकायत थी,

ज़िंदगी जीने की मुझे बचपन से ही आदत थी।


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