एक उम्र बीत जाती है
एक उम्र बीत जाती है
एक उम्र बीत जाती है
खुद को समझाने में
एक उम्र बीत जाती है
नये और पुराने में
रिश्तों की कोमल पौध
जब आँगन में पनपती है
एक उम्र बीत जाती है
इसे धूप से बचाने में
पल में उजड़ जाते हैं घर
सिर्फ़ शक की बुनियाद पर
एक उम्र बीत जाती है
घर को घर बनाने में
थक जाता है पौरुख
साथ देती नहीं हिम्मत
लाचार और बेबस माँ
करती है अब मिन्नत
कल तक थे जिसने
सबके नख़रे उठाये
आज कोई आये ना
उसके बुलाये
ये मतलबी हैं रिश्ते
झूठे सब बंधन
एक उम्र बीत जाती है
इस बात को भुलाने में
एक उम्र बीत जाती है
खुद को समझाने में …।
