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Meet Banarasi

Others

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Meet Banarasi

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रोटी

रोटी

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कहाँ से कहाँ ले के जाती है रोटी

गाँव देस अपना छुड़ाती है रोटी

भटकते फिरें हैं पाने को इसको

फिर भी नहीं हाथ आती है रोटी


किसी को मिले ठौर तपती जमीं पर

किसी को महल दिलाती है रोटी

अमीरी में कोई नहीं मोल इसका

 ग़रीबी को पल पल छलाती है रोटी


 सूनी तप्त दोपहरी में देखो

 मीलों तक चलाती है रोटी

 कोमल नन्हे पावों में चलकर

 छाले तक दे जाती है रोटी


 किसी को मिले है ये थाली में सजकर

 किसी को भूखा सुलाती है रोटी

दिखाती कभी है ये शहरों के सपने

कभी माँ का आँचल तरसाती है रोटी


नन्हें मासूम की आँखों के सम्मुख 

माँ को मौत की नींद सुलाती है रोटी

‘मीत ‘अक्सर मन में सवाल है उठे 

क्यूँ इतना सबको सताती है रोटी

कहाँ से कहाँ ले के जाती है रोटी ।


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