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Deepti Sharma

Abstract

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Deepti Sharma

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दूर से सलाम करते हैं

दूर से सलाम करते हैं

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टपकी जब उसकी आंखों से बूंद तो यूँ लगा के,

आज जज्बात बिखर ही जायेंगे !

हैरत मुझे तब हुई जब उसने खुद को संभालकर 

होठों पर झूठी मुस्कान की रोशनी बिखेर दी !


मुमकिन नहीं अब हर वक्त

अल्फाजों को दर्द का सहारा बनाना !

कुछ दर्द अब हम अपनी पलकों में छुपाए रखते हैं ! 

हँसते है जब हम न उम्मीद मौकौं पर,

लोग तब भी हमारी हँसी के कायल रहते हैं ! 


कमजोरी है हमारी उन महफिलों में जाना,

जहां लोग हमारा इंतजार करते हैं ! 

मतलबी और बैगानों की महफिलों को तो हम वैसे ही,

दूर से सलाम करते हैं !


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