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Kahkashan Danish

Abstract

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Kahkashan Danish

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दुआ

दुआ

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आदमी कितना मजबूर है,

अपनों से भी हुआ दूर है।

कैद भी अपने ही घर हुआ,

जाने क्या रब को मंज़ूर है।

बंद हैं दर इबादत के अब,

दिल में रब का मगर नूर है।

अब ख़ुदा से ही मांगो दुआ,

दर्द करता वो ही दूर है।।


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