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Murli Gupta

Tragedy

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Murli Gupta

Tragedy

दफ्तर के बाबू

दफ्तर के बाबू

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दफ्तर के जो बाबू होते हैं, वो साहब के तलवे के नीचे होते हैं।

इनको आंखें दिखाना, डांट लगाना, चाहे पशुओं की तरह फटकारना,

ये उफ्फ तक ना करेंगे। 

अरे करें भी क्यों दफ्तर के बाबु जो ठहरें।


कई बार साहबों की गलतियों का है बोझ अपने सर लेते,

कई बार रोटियां है हाथों से छूट जाती,

काम को हैं जो इतना प्राथमिकता देतें।

दें भी क्यूं ना दफ्तर के बाबू जो ठहरें।


नहीं करती घड़ी की सूइयां निर्धारण इनके काम का,

देह थक जाए, मन परेशां हो जाए तब करना है इनको काम को।

क्या करें दफ्तर के बाबू जो ठहरें।


भूल जाते हैं काम कि जिम्मेदारियों के बीच, कि कोई और भी जिम्मेदारी है इनकी।

घर है परिवार है,

कहाँ हैं, कैसे हैं, क्या चल रहा है उनके जीवन में कुछ खयाल ही नहीं।

भूले भी क्यूं ना दफ्तर के बाबू जो ठहरें।


दोस्तों के साथ भी इनका कुछ इसी तरह का हाल है,

साथ होके भी गैरहाजरी का माहौल है। हैं

यहां पर, पर खयालों में कोई और है, कुछ और है।

हो भी क्यों ना दफ्तर के बाबू जो ठहरें।


पहले थी बेधड़क शी ज़िंदगी, अब जी हाँ, जी हां में गुजरती है। 

क्या बोलूं, कहां बोलू या चुप्प ही रहूं।

इन्हीं उलझनों में उलझे रहते हैं।

क्या करें दफ्तर के बाबू जो ठहरें।


चलिए दफ्तर के बाबू ने किसी तरह दफ्तर में जीना तो सीख ही लिया।

चाहे कितना भी बुरा हो इसने इसे अपना दूसरा घर ही तो समझ लिया।


वैसे ही जैसे तिनकों से बुनियाद बनाते हैं,

बिना पतवार कि नाव चलाते हैं।

खैर अभी कोई आंधी नहीं आयी,

नदियों में कोई तूफान नहीं उमड़ा।



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